अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो पीड़ित को ₹25,000 प्रतिदिन की दर से मुआवजा - Allahabad High Court
???? इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला — अवैध हिरासत पर कड़ा प्रहार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में अवैध हिरासत (Illegal Detention) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो पीड़ित को ₹25,000 प्रतिदिन की दर से मुआवजा प्रदान किया जा सकता है तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
✅ 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत नागरिक के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।✅ अवैध हिरासत के प्रत्येक दिन के लिए ₹25,000 प्रतिदिन तक का मुआवजा दिया जा सकता है।✅ जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।✅ राज्य और उसके अधिकारियों को नागरिकों की स्वतंत्रता एवं गरिमा की रक्षा करनी होगी।✅ संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है।
डॉ. एंथनी राजू, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, चेयरमैन – ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ ह्यूमन राइट्स, लिबर्टीज एंड सोशल जस्टिस (AICHLS), ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा:
"अवैध हिरासत, पुलिस प्रताड़ना और मनमानी गिरफ्तारी लोकतंत्र और संविधान पर सीधा आघात है। प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय प्राप्त करने का अधिकार है।"
उन्होंने आगे कहा:
"जब किसी निर्दोष व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं बल्कि संविधान की आत्मा पर हमला है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।"
⚖️ यदि आप या आपका कोई परिचित अवैध हिरासत, पुलिस प्रताड़ना, गैर-कानूनी गिरफ्तारी, थर्ड डिग्री टॉर्चर या किसी अन्य मानवाधिकार उल्लंघन का शिकार हुआ है, तो हमें तुरंत सूचित करें। उपलब्ध तथ्यों एवं कानूनी अधिकारों के आधार पर उचित कानूनी कार्रवाई, रिट याचिका, मुआवजा दावा एवं अन्य वैधानिक उपायों हेतु सहायता प्रदान की जा सकती है।
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डॉ. एंथनी राजूAdvocate, Supreme Court of IndiaChairman, All India Council of Human Rights, Liberties and Social Justice (AICHLS)Top Criminal Advocate | Human Rights Defender | Global Peace Ambassador
DISCLAIMER:यह पोस्ट विभिन्न समाचार रिपोर्टों, मीडिया स्रोतों एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल कानूनी जागरूकता एवं मानवाधिकार संरक्षण को बढ़ावा देना है। यह किसी विशिष्ट मामले के लिए कानूनी राय या विधिक सलाह नहीं है। संबंधित न्यायिक आदेशों एवं तथ्यों का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है।
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