19 साल के अरनव खैरे ने लोकल ट्रेन में सिर्फ इतना कहा — “भाई थोड़ा आगे बढ़ो।”
19 साल के अरनव खैरे ने लोकल ट्रेन में सिर्फ इतना कहा — “भाई थोड़ा आगे बढ़ो।”
लेकिन यह एक साधारण-सा वाक्य उसकी ज़िंदगी की आख़िरी गलती बन गया।
कुछ लोगों ने उसे सिर्फ इसलिए पीटा… क्योंकि उसने हिंदी में बोल दिया।
अरनव ख़ुद एक मराठी परिवार से था —
फिर भी भाषा की नफ़रत और अंधभक्ति ने उसे ऐसी चोट पहुँचाई कि
वह सदमे और अपमान में परीक्षा बीच में छोड़कर घर लौटा…
और अपनी जान ले ली।
एक नौजवान, एक सपनों से भरी उम्र —
सिर्फ इसलिए खत्म हो गई क्योंकि उसने अपनी ही देश की भाषा में एक लाइन बोल दी।
यह महाराष्ट्र की पहचान नहीं है।
यह भाषा का गौरव नहीं — यह इंसानियत का सबसे बड़ा पतन है।
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Dr. Anthony Raju, Advocate Supreme Court & Chairman, Indian National Human Rights Protection Council की कठोर और प्रखर निंदा:
“मैं अरनव खैरे की मौत की घटना की घोर, कड़ी और बिना किसी शर्त के शब्दों में निंदा करता हूँ।
किसी भी राज्य, समाज या भाषा की असली ताकत इंसान की जान बचाने में है, न कि उसे छीन लेने में।
भाषाई नफ़रत के नाम पर एक मराठी बच्चे की जान जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है — और यह मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन है।
इस घटना के सभी दोषियों पर तुरंत, कठोर और उदाहरणीय कार्रवाई होनी अनिवार्य है।”
क्या सच में ऐसा महाराष्ट्र चाहिए —
जहाँ भाषा की राजनीति एक बच्चे की जिंदगी निगल लेती है?
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